जिंदा
मुझमें मैं ज़िंदा तो हूं,
भूल कैसे जाती हूं मैं,
मेरा चिल्ला के गीत गाना,
शीशे के सामने खुद को,
देखकर मुस्कुराना।।
बताओ कैसे भूल गई हूं,
मैं खुद से खुश होके बतियाना,
नाचना अकेले किसी कमरे में,
और फिर पागलों की तरह,
खुश हो जाना।।
कैसे कह देते हैं लोग,
के मैं जी नहीं रही हूं,
कैसे मैं मान भी लेती हूं,
जिंदा नहीं बचा है मुझमें,
वो जिन्दगी का जी पाना।।
नहीं,ऐसा तो नहीं है,
बस कुछ पल के लिए,
मैं भूल गई हूं शायद,
के मुझमें मैं जिंदा हूं,
हां,आता है मुझे...
हर पल को अंदर समेट जाना।।
~आदित्याChoudhary

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