2022-January

1/31
तुम ख़ुश रहना हर दिन,ये नए साल से नाता मेरा नहीं है,
लोग तुम्हें लाख झूठ बोलेंगे,मगर झूठ से वास्ता मेरा नहीं है...
सब दुश्मन हैं मेरे और सब मेरे यार हैं,
इनमें फर्क न करने से कुछ जाता मेरा नहीं है...
ओर जो रकीब मेरे हैं,वो मुझसे प्यार करते है...
किसी का आशिक़ होने में मुनाफा मेरा नहीं है।।
~आदित्याChoudhary

Meaning of last 4 lines:- 
        All are my enemies and all are my friends, Nothing is lost by not distinguishing between them...(jb hm kisi ko dost ya dushman man lete hai,toh jindgi ko fr hm phle se man kar jeete hai or kisi insan me kuch or acha nhi dhundh paate.)
 
रकीब-lover's second lover.
jo rkeeb mere hai,means jo mere premi k premi hai...vo mujhse pyaar krte hai...kyuki mera ek premi main khud hi hoon...
esiliye jb rakeeb bhi mujhse pyaar kr rhe hai toh kisi or ka premi m kyu hou...usme mera koi munafa nhi hai...

2/31
वो पूछते हैं जानां सब खैरियत है क्या,
मसला ये है के मैं बोल नहीं पाता सामने उनके...
जवाब में लिखो कुछ पन्ने तुम,
पढ़कर मेरी आंखों को...
मलाल ये है के वो देख नहीं पाते आंखें मेरी,
तो पन्नों से बतलाओ तुम मेरे जज़्बातों को...
एक रहम और करना मुझ पर,
उन्हें कहना के मैंने कहा है-
जरा मुस्कुरा लिया करो रातों को...
इतने भी बेबस मत बनो इस जहां में,
जानां कभी तो समझा करो हालातों को।।
~आदित्याChoudhary

3/31
लम्हा लम्हा रहती है कोशिश,कुछ ईजाद (invention) करने की...
लम्हा लम्हा कुछ इज़ाद(increse) कर दिया जाता है।।
~आदित्याChoudhary

ये आसमां पर निशान किसने किए,
कौन है जो आसमां को परेशान किए जा रहा?
~आदित्याChoudhary
4/31
इस जहां का भी देखो कैसा कमाल है...
चाहने वाले बदल गए हैं, दुश्मन वफादार है।।
~आदित्याChoudhary

बातों को मेरी क्या समझोगे तुम,
आंखो में जानां मेरे इश्क़ मरता है।।
~आदित्याChoudhary
5/31
क्यूं घबराया है तलवारों से,
क्यूं रण क्षेत्र से,क्यूं कटारों से...
अभी तो जंग शुरू हुई है,
जीतना अभी बाकी है।।
मंजिल बैठी दूर अभी है,
सारा रस्ता बाकी है...
उगल रहा गरमी ये तन,
मन का जलना बाकी है।।
भारी भरकम बातें सुनकर,
तु पीछे ना मुड़ जाना...
राह भरी है कांटों की,
फूलों पर चलना बाकी है।।
उठ फिर से तू हार ना मान,
तू थोड़ा सा साहस जता...
आ फिर से तू मैदान में,
तेरा परचम लहरना बाकी है।।
बाकी है तेरे मन की जीत,
बाकी है वो जश्न जीत का...
वो  आनन्द पाना बाकी है,
पल पल खिल जाना बाकी है।।
वो ऊंची चोटियां पहाड़ों की,
वहां पहुंचना बाकी है...
ये सब पल जीने से पहले,
तेरा मरना अभी बाकी है।।
उठ अब फिर से हथियार उठा,
लड़कर चीखना अभी बाकी है...
जब जब गिरे किसी चोट से तू,
याद रख!जीतना अभी बाकी है।।
~आदित्याChoudhary

 

6/31
महो ब्बत का सफ़र यारों,
बेहद मुश्किल लगा मुझे...
कठोर बन गया जो भीतर से, 
वो शख्स कातिल लगा मुझे।।

हर पल हर पहर सोचना उसे,
मिरा दिमाग़ जाहिल लगा मुझे...
मेरे चारों ओर पानी फैला है,
वो देखो, वही साहिल लगा मुझे।।

कौन अपना है कौन पराया है,
ये बताने वाला तू पहिल लगा मुझे...
तू इस जहां में बेख़ौफ़ खड़ा है,
मेरे यार तू नया राहिल लगा मुझे।।

आ चल तुझे सुनाता हूं कहानी एक,
तू बचपन से है काहिल लगा मुझे...
चलते चलते कुछ ओर बता देता हूं फ़कीर,
इस जिन्दगी में सफ़र नाहिल लगा मुझे...।।

~आदित्याChoudhary

(Meaning:- जाहिल- मूर्ख/नासमझ,
       साहिल - किनारा, पहिल - पहला,
        काहिल - आलसी, नाहिल - मूल )

7/31
इक जमीं है, इक आसमां है...
किसी को कोई खिताब नहीं।।
ये मैदान ए जंग है मेरी जान...
यहां रहमतों का कोई हिसाब नहीं।।
~आदित्याChoudhary
 
8/31
सुबह सुहानी हो रही है,
रातों को आग लगी है...
जल लिया भीतर सारा,
के अब ना कोई आस बची है।।
धरती तरसे बादल को,
बादल को भी प्यास लगी है...
बरसात हुई है जोरों से,
फिर भी धरती सुखी पड़ी है।।
हंसते हंसते रो रहा है,
फ़कीर,देख इस नजारे को...
आंख मसली तो पता लगा,
न जाने कब की आंख लगी है।।
~आदित्याChoudhary
9/31
तुझसे मिलने से पहले खुद से, 
इक मश्वरा कर लूं क्या?
तेरे पास बैठूं या दूर से देख तुझे, 
अपना मन भर लूं क्या?
कोई पुराना दर्द याद कर लूं क्या?
जरा खुद को उदास कर लूं क्या?
गर तू लगाए मलहम तो, 
कोई ज़ख्म हरा कर लूं क्या?
~आदित्याChoudhary


10/31
कभी ईधर उधर उलझा हुआ,
कभी उसकी आंखो में आराम है..
कितना हंसता है वो शख्स,
देखो जो कितना परेशान है।।
~आदित्याChoudhary

11/31
कुछ पाने की ख्वाहिश में,
जो पाया वो भूल गया मैं,
कितने प्यारे कितने अपने,
सबसे पीछे छूट गया मैं।।
भाग रहा हूं हर पल ऐसे,
किसी प्यारे से रूठ गया मैं,
मुझको मालूम नहीं कैसे,
फ़कीर,कितना टूट गया मैं।।
~आदित्याChoudhary

12/31
कुछ उड़ रही है ख्वाहिशें,
कुछ को पकड़े हम बैठे है...
कुछ बातें है उलझी उलझी...
कुछ को जकड़े हम बैठे है।।
~आदित्याChoudhary
13/31
कोई शाम कोई जाम,
नशा नहीं होता अब मुझे,
बस तेरी आंखों से पीने में,
अलग मजा आता है।।
कब तक याद रखेगा फ़कीर,
उनकी छोटी गलतियों को,
तू तो बड़े से बड़ी ,
बात को भुला देता है।।
कौन कहे समंदर को,
खारा समंदर के सामने,
वो इक लहर में ना जाने,
कितने पत्थर डुबाता है।।
जब भी मैं देखता हूं आईना,
पागल लगता है मुझको,
ये आईने का शख्स,
जब देखो मुस्कुरा देता है।।
~आदित्याChoudhary

(Note:- mirror is not clean,but "aaine ka shkhsh muskura to skta h")


14/31
तुम उड़ना चाहती हो क्या?
किसी पतंग की तरह...
क्या कोई डोर तुम्हें खींच रही है?
क्या कोई शोर तुम्हें रोक रहा है?
या तुम ही रुकी हो किसी चरखी में अटकी,
या फिर तुम उड़ी ओर कहीं जा लटकी...
तुम्हें यहां रुकना अच्छा लग रहा है,
या तुम तरस रही हो किसी मदद को...
के कोई धागा तुममें उलझे,तुमसे लड़े,
ओर फिर आजाद कर दे तुम्हें उड़ने को...
या तुम रुकी हुई हो यहां,
बाकी सबको आजाद करने?
मेरी मानो तुम मत डरो,
ना ही तुम उड़ने से रुको...
इस संगीत के शोर से,
तुम भर दो खुद को जोश में,
तुम बह जाओ हवाओं संग...
मगर पकड़े रखना डोर को अपनी,
क्यूंकि इसको छोड़ने के बाद,
तुम नीचे गिरोगी ही गिरोगी...
कोई तुम्हें फिर लूट लेगा,
फिर से तुम्हें उड़ना पड़ेगा...
हां अगर चाहो तुम धागा दूसरा,
तो एक बार टूट के तुम अपने,
आशिक़ की छत पर गिर जाना...
चलो अब मुझे ही सुनोगी,
या उड़ोगी भी,
किसी पतंग की तरह।।
~आदित्याChoudhary
15/31
लाख दौड़ ले रुकने को, 
ये सफ़र चलता रहेगा,
मंजिल मिल चुकी होगी,
फिर भी तू तकता रहेगा।।
मुठ्ठी बन्द करके तू ,
छांव को रोकेगा कुछ पल...
मगर धूप में तुझे,
तेरा अक्श दिखता रहेगा।।
कहीं कोहरा तुझे दिखेगा, 
कहीं साफ आसमां मिलेगा..
साफ रस्ते में दिखेगा नहीं कुछ,  
धुंध में तू बढ़ता रहेगा।।
नौका में बैठ ना देख तू,
समंदर की ऊंची लहरों को...
फ़कीर जीतना बचेगा इनसे,
उतना तू डूबता रहेगा।।
~आदित्याChoudhary

16/31

मैं इस तरह सूरज ना होता,
अगर तुमने चाहत मेरे जलने की न की होती।।
~आदित्याChoudhary
17/31
सब तारे हैं,इश्क़ चांद है...
और जानां, चांद बिना कैसा आसमान है।।
~आदित्याChoudhary


18/31
क्या गजब समां है, मैं तुम्हारे पास बैठा हूं...
तुमने ख्वाबों में मिलना कबसे शुरू कर दिया,?
ये महो ब्ब त की बातें किस मतलब की है...
तुमने ये बेमतलब का काम कबसे शुरू कर दिया?
तेरी आंखों में तो आग उफनती रहती थी ना,
ये तूने कबसे उधार की रोशनी में चमकना शुरु कर दिया?
फ़कीर,सुना तो बहुत है फकीरी के बारे में,
मगर तुमने फकीरी का ये कोनसा पैमाना शुरू कर दिया?
~आदित्याChoudhary

19/31
आंख खोल,उठ जरा,
जा संभाल तेरी कमान...
तू कबसे हारने लग गया...
कबसे तोड़ने लगा मेरा गुमान।।
~आदित्याChoudhary


जीत ले ये जंग कोई,
जंग जो छिड़ी है कबसे..
कई ज्यादा बोल रहे हैं,
कई चूप बैठे हैं तबसे...
चुपी उनकी जरा तू,
आवाज में  बदलने दे...
जो बोल रहे है तबसे,
उनका शोर कम कर दे आज...
आंख खोल,उठ जरा,
जा संभाल तेरी कमान...
तू कबसे हारने लग गया...
कबसे तोड़ने लगा मेरा गुमान।।
~आदित्याChoudhary

20/31
कई साजिशें समझो तुम,
ये तुम किस जहां में बैठे हो?
तुम इन्हें अपना कह रहे,
ये तुम किस गुमान में बैठे हो?
~आदित्याChoudhary
21/31
कितनी बंदिशें मेरे दिल पर हैं,
कितनी तुझ पर लगी होंगी जाना,
खैर छोड़िए,क्या तुम भूल जाओग,
क्या मैं भुला पाऊंगा,कहता रहेगा लाख जमाना।।
~आदित्याChoudhary

22/31
मैं लिखता हूं तो महो ब्ब त लिखता हूं..
मगर मैं भूल गया हूं,मुझे क्या लिखना है...
वफ़ा बेवफा इन सबसे तो ऊपर हूं मैं,
मगर फ़कीर इतना भी क्या महोब्बत से परहेज़।।
~आदित्याChoudhary

सोच रहा था कहीं खड़ा फकीरा,
 दूर दुनिया के झमेले से।।
ये इतना शोर किसने मचाया है अंदर,
जैसे किसी का बच्चा खोया है मेले से।।
मुझको बख्श लख दुख मालिक मेरे,
बशर्ते सब के सब हों तेरे थेले से।।
मैं मुस्कुराता रहता हूं खड़ा बीच मझधार में,
वैसे तो कितने धक्के लगते है मुझको इस रेले से।।
मिला तो नहीं कुछ मुझे मगर ढूंढता रहता हूं,
खुद में देख रहा हूं कुछ राही, खिले हुए बेले से।।
पहाड़ पर खड़ा हूं एक ढलान का पत्थर देख रहा हूं,
और पूछ रहा हूं,फ़कीर कितना बड़ा है तू इस ढेले से।।
~आदित्याChoudhary

("बेले":- Jasmine
"ढेले":- a part of stone)

23/31
मैं लड़ता रहूंगा तब तक,
जब तक मैं खुश नहीं हो जाता...
ये हार कर मायूस होना,
याद दिलाता है मुझे जीत की खुशी।।
~आदित्याChoudhary

(About the picture:- one of my favourite corners.)

24/31
किसी कमरे के कोने में बैठने वाला ये शख्स,
कबसे बैठने लगा है इस कमरे के कोने में??
मायूस ना हो दिल मेरे जरा भी वक्त नहीं लगता,
महो ब्बत होने में और महो ब्ब त खोने में?
मगर साजिश तो मैं ये मानता हूं,जब से खुदसे मिला हूं,
दिल ही नहीं भरता किसी और का होने में।।
सबको देखकर बस मुस्कुरा देता हूं,फ़कीर हूं,
डरता हूं के रह ना जाऊं किसी के दिल के कोने में।।
~आदित्याChoudhary
25/31
ये ख़्वाबों ख्यालों की दुनिया,
ये मसलों सवालों की दुनिया।।
ये दुनिया है बड़ी उलझी सी...
मगर ये है कई घोटालों की दुनिया।।
बाहर से सुंदर,भीतर से फीकी,
ये दिखावटी मसालों की दुनिया।।
सब भुला के भी सब याद रखती है,
ये नए पुराने मलालों की दुनिया।।
बाहर से बहुत सजी हुई है फ़कीर,
ये भीतर से कालों की दुनिया।।
~आदित्याChoudhary
26/31
मेरी आंखों में इश्क़ मरता है,
तुम जिंदा रह पाओगे क्या?
~आदित्याChoudhary
27/31
इक गहरा कुआं है मेरे अंदर,
क्या तुम तली तलक पहुंच जाओगे?
रहने देते हैं ये अंदर बाहर की बातें,
कब तक मुझको सुनते जाओगे?
रुके हो अगर किसी गैर केे शहर में ,
क्या पता तुम अपना बटलाओगे?
तुम यूं करो के जाने दो मुझे,
ये अगर मगर करके कब तक घुमाओगे?
~आदित्याChoudhary

28/31
इस शहर की रोशनी बहुत चुभती है मुझे,
पर अंधेरे का डर उससे भी भारी है...
ये सुबह शाम ही अच्छे लगते हैं,
इन्हें नहीं मालूम इनकी खूबसूरती का,
तभी तो सुबह को दोपहर की जल्दी है,
और शाम को रात की तैयारी है...
फ़कीर वक्त से सीख जा तू गुरूर का ये मसला,
चाहे तू कितनी भी मुठ्ठी बन्द कर,
चाहे तू कितना भी चिल्ला के रोक ले,
वक्त की ये सुई हरदम जारी है।।
~आदित्याChoudhary
29/31
ये सुंदर जहां है,ये कैसा है मेला ...
यहां बातें तेरी है,पर तू है अकेला,
तू सबसे मिला है मगर दूर है ये रेला...
मिल जा तू खुद से,बजाए जा बेला...
ये चमकती नगरी,तेरे अंदर अंधेरा...
बस फ़कीर तू है और सबमें हिस्सा है तेरा।।
~आदित्याChoudhary
30/31
लिख के कहानियां कई मैं मेरा किरदार लिखना भूल गया।।
~आदित्याChoudhary

31/31
इस शहर ए गम में हम सुकूं की तलाश करते है,
पहाड़ों तक जाते है,मगर अकेले बैठ खुद से बात करते हैं...
बातों की चादर बुनते रहते है कड़ाके की ठंड में,
हम भी ये रुकने के वक्त कैसी शुरुआत करते है।।
~आदित्याChoudhary


                         Happy January!

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