इक कहानी 🍁
15Oct,2022
मैं बैठी थी और सोच रही थी कि कुछ लिख लूं। मैं अक्सर भूल जाती हूं कि मैं लिख भी सकती हूं, मैं पिरो सकती हूं शब्दों के मोतियों की माला। मुझे अपनी कोई पुरानी कविता पढ़कर ये याद आया कि कितनी सुंदर होती है माला शब्दों की,मगर मुझे इसकी याद उस तिजोरी में रखे कीमती हार की तरह किसी खास मौके पर आती है। चलो आज को खास ही बना लेते हैं,एक कहानी सुनाकर एक किस्सा बना लेते हैं।।
अक्सर प्रिंटआउट किए कुछ धुंधले पन्नों को वाचनालय की एक टेबल पर बैठे निहारने वाली एक लड़की आज उदास बैठी थी। समझ नहीं आ रहा था कि उसकी तेज से भरी आंखे आज नम सी क्यूं प्रतीत हो रही थी। वो हर रोज वाचनालय में आने वाली पहली इंसान थी और रात को कुछ साढ़े नौ दस बजे तक मन में कुछ संतोष असंतोष की लड़ाई लड़ते वहां से जाने वाली लड़की भी वही थी। शायद अपनी पढ़ाई को लेकर वो बहुत गंभीर थी और किसी कॉम्पिटिशन एग्जाम की तैयारी कर रही थी। हररोज लाइब्रेरी आना और हर रोज उस जोश के साथ पढ़ाई करना उसके चेहरे पर दिख जाता था। अपने पन्नों को खत्म करते करते वो ना जाने कितनी कॉपियां भर चुकी थी और उसके पेनों का भी हिसाब मेरे पास तो नहीं है मगर महीने में लगभग छह से आठ पेन का हिसाब मैने लगाया है। वाचनालय में आने वाले हर विद्यार्थी के लिए वो एक मोटीवेशन थी लेकिन आज वो नम आंखों के साथ बेमन से एक डायरी में पेन चलाते हुए ना जाने क्या हिसाब लगा रही थी।
हो सकता है वो लड़ रही थी खुद से या फिर निचोड़ रही थी अपने ख्वाबों के आसमान को बिना पानी जमीन पर गिराए। आंखें पूरी तरह भरी हुई थी,उसको देख लगा जैसे पेज के अक्षर आज धुंधले दिख रहे होंगे,जैसे प्रिंटआउट में स्याही ढंग से नहीं लगी।
उसे देख मुझसे रहा नहीं गया,मैंने पास जाकर फुसफुसाकर पूछ ही लिया कि क्या हुआ? मगर वो सिर्फ एक झूठी मुस्कान के साथ "कुछ नहीं " का जवाब देकर शांत हो गई। उतनी शांत जितनी वो गम्भीर रहते हुए हमेशा रहती है।
कुछ समय तक मैने सोचा अब और कुछ पूछना सही नहीं है,अशांत मन से वो शांत प्रतीत होती हुई डायरी के पन्नों पर लगातार पेन चला रही थी। कुछ समय बाद वो उस डायरी के साथ वहां से उठी और वाचनालय के दरवाजे की ओर बढ़ते बढ़ते वहां कुछ चिंता,विचार और असामंजस्य की स्थिति छोड़कर वहां से गायब हो गई।
काफी देर बाद वाचनालय के बाहर बतियाते बच्चों से पता चला कि एसएससी सीजीएल की आंसर की आ चुकी है,फिर मुझे आंखों की नमी का कारण समझ आया।
तभी मेरी नजर फिर से वाचनालय की ओर आती उसी लड़की पर पड़ी,कहने का मन था कि कोई नहीं अगली बार हो जाएगा कभी कभी किस्मत साथ नहीं देती,मगर कहना सही है कि गलत समझ नहीं आ रहा था। मैंने उसे 'हाय!' बोल ही दिया और उससे फिर पूछ लिया "क्या हुआ?"
इस बार वो बोली "कुछ नहीं बस रिजल्ट", मैंने "कोई नहीं अगली बार हो जाएगा कभी कभी किस्मत साथ नहीं देती" बोलने के लिए खुद को तैयार किया ही था कि उससे पहले ही वो बोल पड़ी कि जब तक परफेक्ट नहीं हो जाते रिजल्ट अच्छा आना भी नहीं चाहिए,अच्छा हुआ मेरा नहीं हुआ क्यूकिं अभी मैं उसके लिए तैयार भी नहीं थी।
इन आखिरी पंक्तियों को कहते हुए उसकी आंखों का तेज फिर से जीवित होता हुआ नजर आया और मैं नि:शब्द खड़े बस उसको जीवित होते हुए देखता रह गया,जैसे ख्वाबों के आसमां को निचोड़ने के बाद फिर से एक ख्वाब का बादल उसमें छा गया हो। लगता है इस बार उससे ख़ुशी ख़ुशी बरसात होगी।
इंतजार रहेगा ख़ुशी के आंसुओं का।
~आदित्याChoudhary


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